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Sankhya Yog se Shanti ki disha me(Hindi).

Sankhya Yog se Shanti ki disha me.

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इस  शीर्षक में हम भगवद गीता  के अध्याय - 2, में उल्लेखित Sankhya yog:  सांख्य योग में श्लोक 71, के  अनुसार  जीवन में शांति प्राप्त करने के बारे में कुछ जानकारी साझा कर रहे हैं।   इस योग की सहायता से हम अपने   inner life software  को जानने व समझने का प्रयास कर  रहे हैं । 

Sankhya yog: सांख्य योग किस हद तक हमारे way of living  को प्रभावित करता  है ? Shanti :  शांति को प्राप्त करने  में क्या  सांख्य योग सहायक  सिद्ध हो सकता है । इन्हीं  प्रश्नों का जवाब पता  लगाने  का प्रयास  यहां पर किया गया है। 

भगवद गीता  एक पवित्र हिंदू ग्रंथ है जो भारतीय महाकाव्य महाभारत का हिस्सा है।भगवद गीता राजकुमार अर्जुन और भगवान कृष्ण के बीच एक वार्तालाप है, जो उनके सारथी के रूप में कार्य करते हैं। संवाद में , कृष्ण अर्जुन को आध्यात्मिक ज्ञान और मार्गदर्शन प्रदान करते हैं, जो कुरुक्षेत्र युद्ध में लड़ने के बारे में भ्रमित और नैतिक रूप से परेशान है।

Sankhya yog: सांख्य योग भगवद गीता का दूसरा अध्याय है और इसे अक्सर "ज्ञान का योग" या "ब्रह्मा का  योग" कहा जाता है। 

इस संदर्भ में "सांख्य" शब्द सांख्य की दार्शनिक प्रणाली को संदर्भित नहीं करता है, बल्कि भौतिक दुनिया से स्वयं के आत्म  ज्ञान  को संदर्भित करता है।

भगवद गीता में Sankhya yog: सांख्य योग अस्तित्व की प्रकृति, स्वयं और आध्यात्मिक प्राप्ति के मार्ग में गहन अंतर्दृष्टि प्रदान करता है.

Sankhya Yog ka kya Arth  hai: 

इस अध्याय में, भगवान कृष्ण स्वयं के वास्तविक स्वरूप (आत्मान) को समझने और भौतिक शरीर और शाश्वत आत्मा के बीच अंतर को समझने के महत्व को समझाते हैं। 

वह निःस्वार्थ कर्म (कर्म योग) की अवधारणा का परिचय देते हैं और कर्म फल के प्रति अशक्ति के बिना अपने कर्म  को पूरा करने के विचार पर जोर देते हैं। 

कृष्ण अर्जुन को भौतिक संसार की नश्वरता और आत्मा की शाश्वत प्रकृति के बारे में सिखाते हैं।सांख्य योग की शिक्षाएं विभिन्न अन्य योग मार्गों, जैसे भक्ति योग (भक्ति का मार्ग) और कर्म योग (निःस्वार्थ कर्म का मार्ग) की नींव रखती हैं। 

अध्याय उद्देश्यपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण जीवन के आवश्यक पहलुओं के रूप में ज्ञान, बुद्धि और आध्यात्मिक समझ की खोज के महत्व पर प्रकाश डालता है।

ब्रह्म ज्ञान ही Sankhya yog:  सांख्य योग है। इसका दूसरा नाम ज्ञान योग है। सांख्य योग में स्थिर मन को शांति एवं आत्मा को जानने एवं प्राप्त करने का साधन माना है।

सांख्य योग का अर्थ है: आत्मा को जानना 

Sankhya Yog : Shanti ki Disha Me:सांख्य योग: शांति की दिशा में एक यात्रा

  • ज्ञानियों के लिए Sankhya yog  ही Shanti एवं भगवान को प्राप्त करने का उचित मार्ग है।
  • सारे कर्म तथा इच्छाएं शरीर में हैं यही शरीर सारे कर्म करवाता है। मन के द्वारा यह कर्म किया जाता है। 
  • आत्मा सदा अकर्ता के रूप में है । आत्मा न कर्म करती है न करवाती है । इस सत्य को तत्वत जानना ही ज्ञान योग अर्थात Sankhya yog: सांख्य योग है

सांख्य योग:ज्ञान योग।अध्याय - 2, श्लोक 71, भगवत गीता के अनुसार शांति प्राप्त करने के लिए  भगवन श्री कृष्ण अर्जुन को निम्नलिखित उपाय बता रहे हैं. 

विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पऋह।
निर्ममो निरहंकार: स शान्तिमधिगच्छति ।।

अर्थ: जो व्यक्ति सभी इच्छाओं को त्याग कर ममता, अहंकार और स्पृह (इच्छा) रहित विचरण करता है वहीं शांति को प्राप्त होता है।

उपर्युक्त श्लोक की टीका सहित सरल शब्दों में व्याख्या : 

  • कर्म योग में कामना का पूर्ण त्याग किये बिना कोई स्थिर बुद्धि नहीं हो सकता है।
  • स्थिर बुद्धि का अर्थ है इन्द्रियों पर संयम । व्यक्ति संसार में रहते हुए कर्म करता है उसे विषय भोग आकर्षित नहीं करते हैं।
  • विषय भोग आकर्षित न करने के कारण वह व्यक्ति निर अहंकारी होता है । अर्थात उसे अहंकार नहीं होता।
  • अहंकार का मूल कारण अपने को आत्मा नहीं शरीर मानना है।
  • लेकिन निर अहंकारी अपने आपको शरीर नहीं आत्मा मानकर कर्म करता हुआ किसी वस्तु को अपना नहीं  मानता।
  • इस कारण ऐसे व्यक्ति को ममता, कामना, अहंकार नहीं होने से असीम Shanti : शांति प्राप्त होती है। 
  • सांख्य योग के माध्यम से हम  जीवन को एक नए आयाम  और समर्पण की दृष्टि से देखना सीख सकते  है।
  •  इस योग में शिक्षा देने वाले श्रीकृष्ण के उपदेशों से हम  यह सीख सकते हैं  कि Shanti : शांति का सच्चा रहस्य आत्मा के साकार और निराकार स्वरूप में छिपा हुआ है

Sankhya Yog is the better management for way of living :

चाहे व्यक्ति संसारी हो या संन्यासी दोनों के संदर्भ में सांख्य योग का यह। श्लोक का मूल भावना यही है कि हम सबसे पहले  स्थिर मन की स्थिर स्थिति को प्राप्त करें। 
  • यदि मन स्थिर है तो यह इन्द्रियों  को भी  स्थिर अर्थात अपने वश में कर लेगा। 
  • इन्द्रियों पर  मन का  नियंत्रण  होने के कारण हमारा शरीर पर मन का नियंत्रण रहेगा।
  • यदि हमारा शरीर व मन  पर हमारा नियंत्रण रहेगा तो हम हम संसारी हो या संन्यासी हमारा अध्यात्मिक एवं भौतिक विकास होना स्वाभाविक है।
  • यहां पर हमारे से मतलब है "आत्मा"से हमारे से मतलब है inner life software से। जो लगातार हमारे जीवन को manage करता रहता है।
  • Better management का एक ही सूत्र है "बुद्धि पर नियंत्रण तभी मन पर नियंत्रण होगा" ।
  • इसका मूल है अपने आपको आत्मा के रूप में मानना व स्वीकार करना ।  प्रकार की way of living को  शुरू कर देने से हम एक कदम अध्यात्मिक शक्ति एवं Shanti  की ओर बढ़ सकते हैं।

In conclusion : 

सारांश में: मन , शरीर  एवं आत्मा तीनों के संतुलन से जीवन बसर करना,संसारी व्यक्ति के लिए शांति एवं सुख का आधार है । 
आत्मा ,शरीर एवं मन में भेद करना ही Sankhya yog:  सांख्य योग दर्शन का सिद्धांत  है।

इस श्लोक से  हम यह समझ सकते हैं कि कर्म में समर्पण और स्थिर बुद्धि  के माध्यम से ही अद्वितीय आत्मा से मिलन होता है, जो  Shanti : शांति का मूल स्रोत है
अपनी अनंत दया और प्रेरणा से भरे हुए सांख्य योग के इस श्लोक से हमें पता चलता है कि असली शांति और सुख वहां हैं जहां हम अपने कर्तव्यों को समर्पित भाव से आत्मा के साथ मिला देते हैं। 
Sankhya yog: सांख्य योग  के इस अध्याय में  हमें पता चलता है कि अपने way of living अर्थात स्थिति को जानकर  शांति की अद्वितीय अनुभूति  का अनुभव किया जा सकता है और यह जीवन को एक नए स्तर पर उच्चारित करता है

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